Motivational Story in Hindi- जैसी करनी वैसी भरनी

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Motivational Story in Hindi- जैसी करनी वैसी भरनी


जैसी करनी वैसी भरनी 


जापान में ऐसी किंवदंती है कि एक समय एक स्थान पर दो भाई रहते थे। बड़े भाई की बहू कुछ तीखे स्वभाव की थी। इसलिए उनकी माता छोटे भाई के साथ रहा करती थी। छोटा भाई निर्धन था। उसके घर में खाना पीना भी पर्याप्त नहीं होता था। प्रायः छोटा भाई अपनी माता जी को बढ़िया भोजन की तो बात ही छोड़ो, साधारण अन्न भी नहीं दे पाता था। नए साल के प्रथम दिन उसके मन में चावल बनाकर खिलाने की तीव्र इच्छा हुई। ऐसे समय में मैं विवश हूं। बड़े भाई से उधार मांगने के सिवाय मेरे पास कोई साधन नहीं है। यह सोचकर वह बड़े भाई के घर गया।

”भाई साहब! थोड़े समय के लिए कुछ चावल मुझे उधार दीजिए जंगल में जाकर लकड़ियां इकट्ठी कर बेच दूंगा। जब पैसा मुझे मिल जाएगा, तो चावल खरीदकर आपको वापस कर दूंगा।“ छोटे भाई ने नम्रता से मांगा। किंतु बड़ा भाई अत्यंत निर्दयी प्रकृति का था।

”तुमको उधार देने योग्य एक धान भी मेरे पास नहीं है।“ यह कहकर गुस्से से दांत पीसते हुए उसने उसे भगा दिया।

छोटा भाई निराश अवश्य हुआ, पर उसकी मातृ भक्ति में कोई अंतर नहीं आया। वह विवश होकर सुदूर पहाड़ तक जाकर पहाड़ी फूल ही ले आया। उन फूलों को बेचकर उसने चावल खरीदना था।

”पुष्प वाला, पुष्प वाला, फूल-फूल, नए वर्ष के फूल, सुंदर फूल, जो चाहो, खरीदो।“ आवाज लगाकर उसने इधर उधर घूम घूमकर देखा, किंतु असफल रहा। पहले से ही लोगों ने नए साल के लिए फूलों की व्यवस्था कर रख थी। उसकी निराशा का ठिकाना न रहा। वह चलते चलते समुन्द्र तट पर आ गया। लहरें कभी उठतीं, उमड़तीं, ठाठें मारतीं, लहरों की तीव्र आवाज के साथ ऊंची और नीची लहरें आती जातीं, उन लहरों को देखते हुए छोटे भाई के मन में विचार आया, ‘सुदूर पर्वत से ये सब फूल बड़ी मेहनत से उठाकर ले आया था, पर एक भी खरीरदार नहीं आया। अब मैं क्या करूंगा। हां, मैंने सुना है, समुन्द्र के तल में नागराज का महल होता है। वहां से नागराज को पुष्प दान करना ही श्रेयस्कर होगा। नाग प्रसाद में जाकर संभव है, इन फूलों का स्वागत किया जाए। मन में यह सोचकर छोटे भाई ने समुन्द्र में ऊंची लहरों को लक्ष्य कर जितने फूल लेकर आया था, सब समर्पित कर दिए।

”हे नागराज! मेरा पुष्प दान स्वीकार करो।“ यह कहकर ज्यों ही उसने लहरों के बीच फूल फेंके, त्यों ही उन लहरों के भीतर से एक पुरूष प्रकट हुआ। उस पुरूष ने कहा, ”धन्यवाद नौजवान! सही बात कहूं तो नागराज के महल में नूतन वर्ष के लिए फूलों के न होने के कारण हम सब चिंतित थे। आपको सचमुच बहुत बहुत धन्यवाद। इतने सुंदर फूल, इतने अधिक फूलों के लिए मैं किस प्रकार आपका आभार व्यक्त करूं, इसके लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं। हां, यदि आप स्वीकार करें तो, मैं धन्यवादार्थ आपको नाग महल में ले चलता हूं। क्या आप मेरे साथ चल सकते हैं?“ यह सुनकर छोटे भाई ने कहा, ”घर में मेरी माता जी हैं। वह मेरी प्रतीक्षा कर रही हैं। मैं नहीं जा सकता।“

मना करने पर भी उस पुरूष ने आग्रह किया, ”नहीं, नहीं! आपको चलना ही पड़ेगा। जहां मैं चलूंगा, वहां मेरे पदचिन्हों के ऊपर चलते आइए, शीघ्र ही हम नाग प्रासाद में पहुंच जाएंगे। वहां के प्रजाजनों से मिलकर आपको भी प्रसन्नता होगी।“

”अच्छा, तो फिर…“ कहकर छोटे भाई ने लहरों के ऊपर पैर रखा। पलक झपकते ही वे नागराज के महल के द्वार पर खड़े थे। सामने सात द्वारपाल खड़े थे, जो भाला, तलवार आदि शस्त्रों से सुसज्जित थे। सभी के शस्त्र चमक रहे थे। महल की छत सोने से बनी थी। छत के ऊपर श्वेत, लाल आदि रंग बिरंगी चिड़ियां खेलने में मगन थीं। अब यह निर्णय हुआ कि नागराज के दर्शन करें। उस पुरूष ने छोटे भाई को समझाया, ”जब नागराज आपसे पूछें कि क्या वरदान चाहिए, तब आप कह देना कि मुझे कुत्ता चाहिए। इस नाग महल में एक अमूल्य कुत्ता रहता है।“

नागराज ने महल में विशेष मछलियों का भोजन तैयार करके छोटे भाई का सत्कार किया। तीन दिन के आतिथ्य में समुन्द्र में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ नाना प्रकार के भव्य भोजन तैयार किए गए। भोज के साथ मधुर समुन्द्र गीत भी लगातार सुनाया जाता रहा। तत्बाद जब स्वदेश जाने का समय आया, नागराज ने पूछा, ”उपहार में क्या चाहिए?“

छोटे भाई ने कहा, ”आपने मुझे बहुत कुछ दे दिया है, फिर भी यदि आप चाहते हैं तो मुझे एक कुत्ता दे दीजिए।“

राजाज्ञानुसार तुरंत राजा के सामने एक कुत्ता ले आया गया।

नागराज ने कहा, ”यह कुत्ता महल में सर्वाधिक मूल्यवान है। कृपया इसे संभाल कर रखें। ध्यान रखिएगा कि प्रतिदिन चार मेजों पर भरपूर भोजन तैयार कर इसे खिलाना जरूरी है। यदि यह आप कर सकें तो अवश्य ही आपके लिए यह बहुत भाग्यशाली सिद्ध होगा।“

छोटे भाई ने वचन दिया, ”स्वीकार है, ऐसा ही करूंगा। आपकी आज्ञानुसार मैं इसे प्रेम से संभाल कर रखूंगा।“

उसने नागराज से विदाई ली और अपने देश की और लक्ष्य कर वापस चल पड़ा। मालूम हुआ कि नागराज के महल में तो वह सिर्फ तीन दिन रहा था, किंतु वास्तव में तीन वर्ष का समय व्यतीत हो चुका था। माता जी के पास खाना तो था नहीं, पड़ोसी लोगों को उनकी देखभाल करनी पड़ी थी। जब नागराज से छोटा भाई कुत्ता लेकर आया, तो पड़ोसियों ने पूछा, ”जब अपने लिए भी खाना पूरा नहीं होता, ऐसी स्थिति में कुत्ता लाकर क्या करोगे?“

छोटे भाई ने कहा, ”आप संयम से कुछ समय देखते रहिएगा।“ वह प्रतिदिन चार मेजों पर यथा संभव भव्य भोज बनाकर कुत्ते को उसी तरह खिलाता था, जिस प्रकार किसी मालिक को खिलाया जाता है। कुत्ते ने खाना खा लिया। खाने के बाद वह पहाड़ पर चला गया। वापस लौटा तो अपने मुख में एक बड़ा सा रीछ पकड़ लाया। जिसे देखकर छोटा भाई व मां हैरानीचकित हो गए। उसका मांस, चमड़ा, दांत, सब कीमती थे। अब उन्हें रोज एक रीछ मिल जाता था। देखते देखते वे धनी बन गए। एक दिन बड़े भाई को मालूम हो गया और वह दौड़ता दौड़ता छोटे भाई के पास आया।

”क्या तुम्हारे पास एक ऐसा कुत्ता है जो रोज एक रीछ लेकर आता है?“ आते ही बड़े भाई ने छोटे भाई से पूछा।

”जी भाई।“ उत्तर मिला।

”यदि ऐसा है तो मैं उस कुत्ते को एक बार ले जाता हूं।“ बड़े भाई ने रौब से कहा।

”नहीं भाई जी, ऐसा नहीं हो सकता। आप मेरे बड़े भाई जरूर हैं, परंतु यह कुत्ता मेरे लिए खजाना है। मेरा कुत्ता सुवर्ण तुल्य है।“

बड़े भाई ने उसकी बात न मानी और बलपूर्वक कुत्ता ले गया। घर जाकर उसने पांच छः मेजों पर विभिन्न प्रकार का खाना बनवाया और उस कुत्ते को खिलाया। उनकी मनोकामना थी कि कुत्ता उनके लिए भी अधिक से अधिक रीछ पकड़कर लाए।

कुत्ते ने सब खाना खत्म कर दिया। वह अपूर्व बलवान बन गया और दूसरे क्षण जैसे ही खाना खत्म हो गया, बड़े भाई के सामने कूद पड़ा। उसने बड़े भाई के माथे पर प्रहार किया और उसका माथा काट डाला।

भोजन में ही कोई कमी रह गई होगी। उसे शायद पसंद नहीं आया होगा। यह सोचकर वह छोटे भाई के पास पूछने गया। चार मेज पर भोजन तैयार होना चाहिए था। यह जानकारी लेकर लौटा और कथनानुसार चार मेजों पर भरपूर खाना रख दिया। इस बार नागराज का कुत्ता अवश्य ही रीछ ले आएगा। मन में यह सोचकर कहा, ‘छोटे भाई ने जैसा बताया, वैसा ही बनाकर खाना रख दिया है। तू जल्दी खा और सीधा पहाड़ पर जा। मैं बड़े रीछ की आशा करता हूं यहां बैठकर।’

कुत्ते ने यूं सिर हिलाया जैसे उसकी बातें समझ गया हो, उसने तुरंत ही खाना खाया। बड़ा भाई कुत्ते की सारी गतिविधियां देख रहा था। अब रीछ पकड़ने जाएगा, मन में सोच रहा था। पर आशा के विपरीत पहाड़ की ओर न जाकर वह जोर से भौंका और बड़े भाई की ओर लपका।

उसने बुरी तरह बड़े भाई का घुटना काट डाला। बड़ा भाई दंग रह गया। उसके गुस्से का ठिकाना न रहा।

”बदतमीज कहीं का।“ वह उत्तेजित स्वर में चीखा, ”अरे उपद्रवी। मैंने तुझे इतना प्यार किया और तूने ही मुझे काट खाया। ठहर तो, अब मैं तुझे मौत के घाट उतराता हूँ।“ उसने हाथ में डंडा उठाया और कुत्ते के सिर पर जोरों से मारने लगा। चोटग्रस्त होकर कुत्ता लगभग मृतप्राय हो गया। ऐसा लगता था, मानो गहन निद्रा में डूब गया हो। उसके मुख पर पूर्ण शांति थी।

पर्याप्त समय व्यतीत होने पर भी कुत्ता वापस न मिलने पर छोटे भाई को बहुत चिंता हुई। अंततः परेशान हो स्वयं बड़े भाई के घर गया।

”भाई, मेरा कुत्ता कहां है, वह कैसा है?“ उसे क्या हुआ?

”क्या हुआ? उस बदमाश कुत्ते की हालत तुझे अभी दिखाता हूं।“ और उसने गुस्से से सारी बात बताई। छोटे भाई की आंखें भर आईं। मरे हुए कुत्ते के लिए वह क्या कर सकता था। वह विवश था। धैर्य के साथ बोला, ”उसका शव पड़ा होगा, वही आप मुझे वापस कर दें।“ उसने मृत कुत्ते को अपने घर के सामने आंगन में दफनाया। उसकी समाधि के पास फूलों के पौधे लगाए और जड़ में पानी दिया। करबद्ध मंत्र पाठ किया। श्रद्धांजलि अर्पित की। दूसरे दिन की बात है कि बगीचे में जहां पर कुत्ता दफनाया था, वहां पर छोटा सा बांस का अंकुर निकल आया। रोज पानी डालना और प्रार्थना करना, उसकी दिनचर्या बन गई थी। दिन ब दिन देखते देखते पौधा बड़ा होता गया। और अंत में सचमुच खूब लंबा सीधा सुंदर बांस बन गया। वह बांस ‘सफल आगमन’ नामक अद्भुत बांस था जो दुनिया में अपूर्व था और देवलोक तक पहुंच जाने की क्षमता रखता था। उसका कद क्रमश बढ़ता गया और अंततः वह देवलोक में पहुंच गया। वह और भी ऊंचा होता गया और उसने देवलोक में स्थित धान्यसगार में छेद कर दिया। अन्न के भण्डार में छेद हो जाने के कारण अन्न गिरने लगा।

एक दिन प्रातः काल छोटा भाई उठकर बाहर आया। उन्होंने आंगन में देखा, कि ‘सफल आगमन’ नाम के बांस के फूल में श्वेत चावल का पहाड़ बना हुआ था। अभी भी लगातार सफेद बर्फ के समान चावलों की वर्षा हो रही थी। इस रहस्यमयी घटना को देखकर और यह सोचकर कि यह सब कुत्ते की देन ही होगी, मन ही मन मृत कुत्ते का स्मरण करते हुए धन्यवादपूर्वक श्रद्धांजलि समर्पित की और देवलोक से बरसते चावलों को नए निर्मित गोदाम में ले गया। चावलों की उस अपार राशि को जापानी भाषा में ‘सेंगोकू’ कहते हैं। सफल आगमन नामक बांस की प्रवृत्ति एक दिन में एक गांठ कद बढ़ जाने की थी। हर एक गांठ बढ़ जाने पर एक एक हजार सेंगोकू चावल की वर्षा होती। हर रोज बगीचे में अन्न का पहाड़ बन जाता। जिसे देखकर छोटा भाई प्रसन्न हो जाता। नित्य प्रति बहुत से श्रमिक चावलों को भण्डार में रखते। आखिर एक दिन यह सारी बात बड़े भाई के कानों तक पहुंच गई। एकदम उसके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई और छोटे भाई के पास पहुंच गया।

”क्या तुम्हारे पास ‘सफल आगमन’ नाम का कोई बांस है जिससे बहुत सी चावल वर्षा होती है? यह सच्ची बात है क्या?“ उसने मिलते ही छोटे भाई से सवाल किया।

”जी हां भाई साहब! आपने तो मेरे प्रिय कुत्ते को मार दिया था, उसी कुत्ते को मैंने भक्तिपूर्वक जहां दफनाया था, वहां पर बांस उग आया है।“

उत्तर मिलते ही बड़े भाई ने कहा, ”तब तुम एक बार उस मृत कुत्ते को मुझे दे दो। मैं उसे अपने बगीचे में दफनाकर देखता हूं।“ पूर्ववत आग्रहपूर्वक वह मृत कुत्ते का शव मांगकर ले गया और उसे अपने घर में दफनाया। दूसरे दिन उद्यान में देखा कि ‘सफल आगमन’ बांस अपना सिर उठा रहा है। बड़े भाई की खुशी का ठिकाना न रहा। क्रमश वह बांस अपना कद बढ़ा रहा था। अब चावल की वर्षा अवष्यंभावी थी। किंतु विडंबना की बात है कि इस बार सफल आगमन नामक बांस ने देवलोक में स्थित कूड़ेदान में छेद किया। देवलोक का सारा का सारा कूड़ा, कचरा गिरा और कूड़े के ढ़ेर में बड़े भाई का घर दब गया। इसी को तो कहते हैं जैसी करनी वैसी भरनी।



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